एक बेबसकी कहानी
हा ये एक कहानी है मगर हो सकता है ये सच भी हो काल्पनिक भी हो जजों भी हो कहानी है बड़ी रोचक .
इन्सान खुदसे औलाद मागता है किसलिए? वो तो पता नहीं कही लोग मानते है औलाद्से अपना वंश चालू रहेगा तो कोई सोचता है की वृध्धावास्थामे सहारा मिल सके. इन्सान सोचता है क्या और्होता है क्या किसीको पता भी नहीं लगता.कभी किसीने ये सोचा की ओलाद क्या मागती है और क्या चाहती है और क्या क्या विचरती है ? ये बड़ी कसंकसभर कहानी है दिल धड़क कहानी है.ये मत भूलो की आजका बेटा कालका बाप भी होगा और आजका बाप कालका बेटा भी था. कौन कैसे समजता है और कैसे उलज़ता है. खेला बचपन हसी जवानी मगर बुढ़ापा तडपता है
मगर यहाँ पर ऐसी बात है जो बचपन खेल्कुद्मे नहीं मगर कुछ कसक कास में बिताहो जवानी हसी खुसी नहीं मगर कुछ छोटी मोतिजवाब्दारी पूरी करनेमे बीती हो और देखो ये ये है किस्मात्की कहानी बुढ़ापा कैसी कसंकसमे बीत रहा है.अपने खून पसिनेसे जिसे सीचा वो पपड़ और पौधा उसे ठोकर मरकर बेबस बना देते है.एक छोटासा पौधा जब बड़ा पेड़ बन जाता है तो उसके ही मालिको कह देता है अब तुम ये बाग़ छोड़कर चले जाओ ये बगीचा मेरा है. बेचारा बुढा बेबस माली जाये तो जाये कहा ?बेबसी तो ये है की उनके सर पर अभी भी एक ऐसा पौधा है जो खिल नहीं पाया और वो उसे कैसे छ्होद सकता है /बड़ा पेड़ बन गया वाला पेड़ अब छोटे पौधेक्लो और मालिको भी परेशां कर रहा है
कहानी कैसे सुरु की जाये कुछ पता नहीं लगता गुजरातीमे कहावत है की पेट पाके तो पाटों क्या बोंधावो ?अपने पेट कहो पर खोलना ?कहानीको असली मोड़ पर कैसे लाया जाये ?ये बघ्बान है ये कहानी घर घरकी है या सिर्फ ऋणानुबंध है अपने ही कोई पुराने पाप करमका फल हम भुगत रहे है या हो शकतं है हमारी ही कोई कमी है बल उछेर्मे या संस्कार देनेमे जो भी हो ये सच है की न तो हम सह शकते है न तो किसीसे कुछ ठीक तरहसे कह शकते है किस्से कहे कैसे कहे किस तरह कहे कोई बात समजमे नहीं आती हम अन्दर ही अन्दर घुटके मर जाते है लोग हमारी लाचारी देखकर हसते है दया खाते है लोगोकी क्या बात करू अपने ही जब परायेसे हो कर हमारी मजाक उड़ाते है हमें हद्धुत करते है हमें अपमानित करनेकी कोई तक जाती नहीं करते अपमानित करनेकी तक खोज रहे है हम ये सब जानते हुए भी कुछ कह नहीं शकते ओऊ सह भी नहीं शकते करे तो क्या करे ? बदनसीबी तो देखो ? हमने किसीसेमदद सही मागी तो क्या मिला ?वो हमारे सस्थ तो नहीं रहे हमें बेबस और लचर कर दिए. कुछ देर बाद पता चला की हमने जिनसे कुछ कहा था वो तो हमारे थे ही नहीं वो तो ठीक मगर वो तो उनके थे जिनकी सामने हमारी शिकायत थी. और हमें ऐसा भी कहा गया की वो लोग तुमारी नहीं हमारी ही सुनेगे क्यों की हमने उसकी बहुत ख़त बर्दास्त की है वो हमें कुछ कह ही नहीं शकता क्योकि वो हमारे एह्संसे दबे हुए है. ये सच भी हो शकता है एक और कहावत सुनो "अन्नानो मार्यो निचु जुवे दांग नो मार्यो सामे जुवे "जैसे भीष्म द्रोण और दुसरे वडिल सभामे चुप रहे थे ठीक उसी तरह हनारे ये वडिल तो नहीं कह शत्कता मगर प्रतिष्टित जानेमाने महानुभावने हमसे जो जताया हम भूल नहीं पयेने.सब ऐसा जाताना चाहते है की भूल हमारी है हमें सुधर जाना चाहिए हमें ही बड़ी बड़ी ......छोडो बात वो अगर क़त्ल भी करते है तो कोई नाम नहीं लेता मगर हम अगर आह भी भरते है तो बदनाम हो जाते है ये ही तो हमारी कमनसीबी है ;
रुकता हु आँखे थक गयी हाथ भी थक गया और मन तो थका हुआ है ही बादमे अगर ठीक होगा तो आगे बढुगा
हम तो ये सोचते है की हम प्रक्टिस कर रहे है हिन्दीमे लिखनेकी
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